एक पुराना रेडियो
एक पुराना रेडियो
अध्याय 1: आधी रात की गूँज
शहर के शोर-शराबे से दूर, 'नीलगिरी विला' नाम का वह घर देखने में जितना सुंदर था, अंदर से उतना ही वीरान। आर्यन ने इस घर को इसलिए चुना था क्योंकि उसे अपनी पहली किताब लिखने के लिए शांति चाहिए थी। उसे क्या पता था कि यहाँ की शांति उसे काटने को दौड़ेगी।
सामान सेट करते वक्त उसे स्टोर रूम के कबाड़ में वह चीज़ मिली—एक पुराना, भारी लकड़ी का रेडियो। उसका एंटीना मुड़ा हुआ था और कांच पर धूल की मोटी परत जमी थी। आर्यन ने उसे साफ किया और अपने बेडरूम की मेज पर एक सजावट के तौर पर रख दिया। उसने चेक किया था, उसमें न सेल थे, न ही बिजली का तार। वह महज़ एक लकड़ी का डिब्बा था।
रात के ठीक 3:00 बजे...
आर्यन गहरी नींद में था, तभी एक तेज़ 'सरसराहट' (static) की आवाज़ से उसकी आँख खुल गई। आवाज़ उसी पुराने रेडियो से आ रही थी। आर्यन हकबका कर उठ बैठा। कमरे में अंधेरा था, लेकिन रेडियो के ट्यूनिंग डायल के अंदर एक धुंधली सी लाल रोशनी जल रही थी।
"ये कैसे मुमकिन है?" आर्यन ने बुदबुदाते हुए हाथ बढ़ाकर उसे बंद करने की कोशिश की। लेकिन बटन घुमाने पर भी आवाज़ बंद नहीं हुई। अचानक, शोर कम हुआ और एक भारी, ठंडी आवाज़ गूँजी—जैसे कोई बहुत दूर कुएँ के अंदर से बोल रहा हो।
"आर्यन... सुबह का सूरज मत देखना। 8:12 पर जब तुम बालकनी में कॉफी पी रहे होगे, रेलिंग का वह हिस्सा टूट जाएगा जिस पर तुम झुकोगे। संभल जाना।"
सन्नाटा छा गया। रेडियो की लाल रोशनी बुझ गई। आर्यन का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसने फौरन लाइट जलाई और रेडियो को पलट कर देखा। वह अब भी वैसा ही बेजान था। "शायद ये मेरा वहम है... या थकान की वजह से दिमाग खेल रहा है," उसने खुद को तसल्ली दी, लेकिन उसकी हथेलियाँ पसीने से भीग चुकी थीं।
अगली सुबह 8:00 बजे, आर्यन अपनी आदतन बालकनी में गया। रात वाली बात उसके ज़हन में धुंधली पड़ चुकी थी। उसने मग में गरमा-गरम कॉफी ली और बालकनी के लोहे की रेलिंग पर हाथ रखकर बाहर के नज़ारे को देखने के लिए आगे झुका। अचानक उसे रेडियो की वह आवाज़ याद आई— '8:12 पर... रेलिंग टूट जाएगी।'
उसने झटके से अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। 8:11:55.
वह जैसे ही पीछे हटा, एक ज़ोरदार 'कड़क' की आवाज़ हुई। पुरानी लोहे की रेलिंग, जो सालों से मज़बूत दिख रही थी, अचानक बीच से टूटकर नीचे तीन मंज़िल गहरी खाई में जा गिरी।
आर्यन के हाथ से कॉफी का मग छूट गया। अगर वह एक सेकंड की भी देरी करता, तो आज वह उस रेलिंग के साथ नीचे होता। उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह दौड़ता हुआ कमरे के अंदर आया और उस बेजान रेडियो को देखने लगा। वह अब सिर्फ एक सजावट का सामान नहीं था... वह कुछ और था।

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